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Wednesday, March 23, 2016

भोजपुरी मिक्स दही बड़ा होली इस्पेशल

(भोजपुरी मिक्स दही बड़ा होली इस्पेशल)
तो भैया बात अइसी है कि २०११ में हमको कम्पनी के तमिलनाडु प्लांट भेज दिया गया, कि जाओ और सॉफ्टवेयर की ट्रेनिंग दो औरु चलवाओ।  लो भइया मच गई भसड़, हमरा दिमाग ताकधिन करने लगा। सुन रखे थे कि वहां वालों को हिंदी से नफरत है और सब बतिया अंग्रेजी में ही करते हैं।  खैर अब जाना था तो जाना ही था। जी तयशुदा टाइम पर हम भी चहुँप गए। पहला दिन वहां के हेड से बात हुई सबको मेल डाल दी गई कि फलां फलां टाइम पर मीटिंग हाल में सब इकट्ठे हो।  चलो जी मरता क्या न करता सब इकट्ठे हुए ४० - ५० लोगों के सामने अपना इंट्रो देने में ही "is, was, because" हो गया,  पूरा कनपट्टी गरम जहें देखो वहीँ से पसीना आ धुंआ निकलने लगा था।  नरेटी बेफलतुवे में सूख रही थी आ हम भकभका के पानी घोंट रहे थे, खैर खुदा खुदा करते इंट्रो पूरा हुआ उसके बाद प्रश्न उत्तर शुरू हो गया। आहि दादा भइल बवाल, अब का होइ ? अबले त अपने के बोले के रहे  आ अब त सुनहुँ के पड़ी, ए डीह बाबा अब का होई ? भइया ओकरी बाद त मदरसिया उ फड़फड़ा फड़फड़ा के अंग्रेजी बोललन स की दिमाग दही हो गइल। ससुरा बुझइबे ना करे कि सेंटेंस में पास्ट प्रजेंट फ्यूचर कब आ कहाँ बोले के बा। अब केकरा के केतना आ "का" बुझाइल ई त रामे जानें। ओ दिन अंग्रेजी के अइसन माई बहिनी भइल की उहो साँझ के बेरा कपार ध के रोवत रहल कि इ बाबू  तूं रहे द, काहे हमार लिंगाझोरी करवावत बाड़ा। 
हम हिंदी मीडियम के विद्यार्थी अंग्रेजी पढ़े भी थे और आती भी थी, लेकिन दिक्कत बोलने की थी, कभी इतना खुद पे कॉन्फिडेन्स नहीं आया था कि अंग्रेजी बोल सकें। उ का था कि अंग्रेजी भी हिंदी मीडियम से पढ़े थे (हा हा हा हा),  बेस था अंग्रेजी का, लेकिन उ बेसवा हिंदी के ढेर में ढेर नीचे दबा गया था। जइसे पिज्जवा का बेसवा देखे हैं ना, जब सजा दिया जाता है त बेसवा का पत्ते नहीं चलता है, ठीक उसी तरह का हमरा भी बेसवा था। धूर माटी में लोटियाया हुआ (हा हा हा हा)। आ हम इतने बज्जर बेहाया थे कि अंग्रेजी बोलने वालों को भी हिंदी बोलवा दिया करते थे। जैसा कि दिल्ली के आस पास का माहौल है कि जिसको अंग्रेजी नहीं भी आती है, वो भी जोड़ बटोर के अंग्रेजी में ही पोंकता है। लेकिन हम इस ममिले में पूरे वाले बज्जर थे। अब गांव का पहलवान कितनों को पटकेगा। और वही हुआ मदरास में जा के पटका गए। अ वहां पटका तो गए लेकिन लुत्ती लगा के भी आए।  अब हाल ये है कि वहां का स्टाफ अच्छी खासी हिंदी बोलने लगा है। बड़ा आनंद आता है उन लोगों से हिंदी में बात करके।  गलत सलत बोलते हैं लेकिन हिंदी बोलते हैं।  अब उन लोगों में कॉन्फिडेंस भरने का काम कर रहा हूँ। 

कुल मिला के बात ये है कि भाषा की बेल्ट के हिसाब ही अगर लिखा पढ़ा जाए तो ठीक है नहीं तो बेज्जती तय है। अब देखा जाए तो फेसबुक पर हम लोगों के बीच कितने लोग अंग्रेजी में लिखते हैं? अब जो लिखता भी है तो  उसकी पोस्ट को पढ़ते कितने लोग हैं? अगर थोड़ा जाना पहचाना चेहरा हुआ तो लोग लाइक कर देंगे लेकिन पढ़ेंगे नहीं। शायद ही कोई एक दो लोग उसे पढ़ेंगे। लिखने का मकसद पूरा नहीं होगा। तो भइया देशी का छौंक मार के जगह के हिसाब से लिखिए, अपने ऑडियंस की भाषा में लिखिए। (और भी बहुत सी बातें हैं तमिलनाडु की, समय प्रति समय उभर कर आती रहेंगी)।

होली के हुरियारे

दस बारह लड़कों का ग्रुप था वो, सभी लगभग किशोरवय पर पहुँच रहे थे, होली के दिन का प्रोग्राम उन लोगों ने कई दिन पहले से ही फिक्स कर लिया था कि क्या क्या ऊधम काटेंगे और किसको किसको परेशान करेंगे कऊँचहा बुढ़वा बुढ़िया से लेकर पढ़ाकू लड़का सबकी लिस्ट बन गई। बस जी होली के दिन अपने लीडर की अगुवाई में इकट्ठा होना शुरू हुए। पहले तो आपस में ही रंग गुलाल से शुरू होकर कीच पांक फिर बूसट फार होली हुई, फिर दूसरों की टाहि में टोली निकल पड़ी। रंगे पुते लड़कों को देखकर गाँव के कुकुर पहले तो डर के भागे फिर लगे भूँकने, और थोड़ी देर बाद उनकी हिम्मत बढ़ी तो लडक़ों को चहेटने लगे, कई बार तो अइसा लगा की काट ही लेंगे।
भागभूग के लड़के सुदामा बाबा की पलान (झोपड़ी) में इकट्ठे हुए। बाबा खटिया पर गहरी नींद में सोए हुए थे, बाबा एक नम्बर के कऊँचहा आ गरिहा थे और इन लड़कों की हिट लिस्ट में थे। बाबा का पोपला मुँह खुला हुआ था, लड़कों को शैतानी सूझ गई। धीरे धीरे रंग बाबा के मुँह पर लगा दिए फिर सर में भी सूखा रंग डालने के बाद लीडर ससुरा एक मुट्ठा धूर उठा के बाबा के खुले हुए मुँह में डालने लगा, वो तो बाकि के लड़के उसे पकड़ लिए, लेकिन पकड़ते पकड़ते भी थोड़ी धूल बाबा में मुँह में पड़ ही गई। बस जी धूल जाते ही बाबा फ़ड़फ़ड़ा के उठ गए। बाबा का उठना था और लड़कों का भागना। और फिर जो  बाबा का मानस पाठ जो शुरू हुआ कि बाप रे बाप आकास के मय देवता भी कान बन्न करके पानी मांगने लगे। कई बार कई पुहुत (पीढ़ी) नेवतने के बाद जा के बाबा चुप हुए। पर जब जब बाबा का हाथ उनके मुँह पर जाता और उनको अपनी हथेली में रंग लगा दिख जाता, बाबा फिर से फूहर से फूहर गारी लेकर शुरू हो जाते। वो तो कहिये मुँह पर रंग पुता होने के कारण लड़कों को पहचान नहीं पाए, नहीं तो लड़कों के साथ साथ उनके घर वालों को भी पूरा खुराक मिलता। खैर लड़के तो अपना काम करके फरार हो चुके थे अपने अगले टारगेट की तरफ। अपने टारगेट पर पहुँचने से पहले लड़के फलाना सिंह के कोल्हाड़ा (गाँव में जहां पशु और पुरष वर्ग रहता है) में इकट्ठे हुए। वहां उनको जाने क्या मसखरी सूझी उन्होंने वहां खूंटे पर बंधे बैठे मरखहे बैल पर पानी फेंकने लगे। ठंडा पानी पड़ने से वो चिहुंक कर झटके से खड़ा हो गया। तभी फलाना सिंह अपने कोल्हाड़ा में आ गए, लेकिन तब तक लड़के पानी का दूसरा राउंड बैल पर फेंक चुके थे। अजी वो पानी पड़ना था और कूद फांद के बैल रस्सी तुड़ा गया। असली आफत अब शुरू हुई। बैल भागने लगा और भागते भागते दो लड़कों को पटक गया, बाकि के लड़के इधर उधर भागे कोई कहीं गिरा कोई कहीं। किसी का घुटना फूटा कोई गिरने से बचने के लिए दीवार फलांग की कोशिश करने लगा, दीवार पर चढ़ने की कोशिश में ऊपरी ईंट उखड़ कर किसी के सर पे गिरी, कोई  लड़खड़ाते हुए पनरोह में गिरा, कोई भाग के भूसे के ढेर पर चढ़ गया।  बाप रे बाप सबकी बड़ी दुर्गति हुई। फलाना सिंह खुद्दे बैल की चपेट में आने से बचे। खैर सबको उठाया पठाया गया लड़कों की सेवा श्रुषा हुई। जो अनकट थे उनको कंटाप लगाया गया। आगे के लिए सबको सख्त ताकीद की गई। जो हुआ सो हुआ लेकिन उन लड़कों की होली मेमोरेबल बन गई।

आप लोग भी उत्पात करिये लेकिन संयम में रह कर। ऐसा न हो कि होली में लेने के देने पड़ जाएं। होली मिलजुल कर ख़ुशी मनाने का त्योहार है इसे मिलजुल कर ही मनाइये।

होली की मस्ती

पहले किरण रिजीजू का मोदी जी के बारे में बयान कि ४०० साल पहले ही मोदी शासन की घोषणा हो चुकी थी, (नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी को कोट किया था उन्होंने ) फिर वेंकैया जी का बयान आया मोदी जी के बारे में की मोदी जी गरीबों के लिए मसीहा हैं और अब शिवराज मामा का बयान कि "मोदी जी जो करते हैं वो मनुष्य के बूते की बात नहीं " हा हा हा हा ये बयान और कुछ नहीं बल्कि विपक्षियों के साथ ही साथ भाजपा के फूफा लोगों  की  सुलगाने के लिए ही दिया गया है। होली पर होलिका तो फूंकी ही जाती है कभी कभी होलिका पर से उठी चिंगारी से आस पास खड़े लोगों की धोती में छेद हो ही जाता है।  तो जी ये बयान बस इन लोगों की धोती में छेद करने के लिए ही दिलवाए गए हैं। मोदी जी आत्ममुग्धता से दूर दिन रात काम करने वाले प्राणी हैं।

रंगों की बौछारों के बीच सत्ता के इस रंग का भी आनंद लीजिये।  खुश रहिये सुखी रहिये और अपनों के संग होली के रंग का आनंद लीजिये। 

Wednesday, November 25, 2015

देश द्रोही है,...... पक्का वाला

याद होगा PK की बंपर ओपनिंग हुई थी उसके बाद बंपर कलेक्शन।  लेकिन बाद में सुदर्शन न्यूज़ ने एक स्टिंग ऑपरेशन किया था जिसमें दिखाया गया था कि लगभग ६०० सिनेमा घरों के बाहर हाउसफुल के बोर्ड लगे थे और अंदर एक भी आदमी नहीं बैठा था। कारण ?.......... अजी वही काले को सफ़ेद करने का काम। ज्ञातव्य हो भारतीय हिंदी फिल्म इंडस्ट्री हवाले की रकम को खपाने का जरिया बन चुकी है। और रकम किसकी ? ..........सब जानते हैं। तो जनाब "दंगल" तैयार है दंगल मचाने को लेकिन इसी बीच दंगल का अखाड़ा दाभोल ने खोद दिया। मने D गैंग की फंडिंग डैश डैश डैश ........ मोदी दाभोल & पार्टी ने सांप के फन पर लात रख दिया अमीरात से लेकर ब्रिटेन तक।  अब हवाले की रकम का आना जाना बंद और चंदा खोर गैंग को मरोड़ें उठनी शुरू। तो जनाब इस असहिष्णुता के पीछे के खेल को समझो।  
आज मेरे ऑफिस का मित्र बता रहा था कि कल वो PRDP अरे वही "प्रेम रतन धन पायो" देखने गया था और सिनेमा हाल में कुल ३ लोग बैठे थे। एक तरफ 300 करोड़ का कलेक्शन और दूसरी तरफ 3 लोग सिनेमा हाल में। तो भइया समझो इस खेल को और जो जो इन असहिष्णु लोगों की तरफदारी कर रहा है समझ लो पक्का देश द्रोही है, पक्का वाला। 

#Uninstall_snapdeal_app

झलक दिखलाओ भाईयों स्नैप डील का एप अन इंस्टॉल करके। इस भाँड़ को भी पता चले की असहिष्णुता किसे कहते हैं।
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शाहरुख़ खान का यू टर्न

शाहरुख़ खान का यू टर्न,  बोले ​- भारत को कभी नहीं बताया असहिष्णु। 
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इसी को कहा जाता है थूक के चाटना। घर घर आ के मारने वाले थे लाला ? क्या हुआ ? देख लिया ना संगठित शक्ति को। जब पेट पे लात पड़ती है ना तो बड़े बड़े घुटना टेक देते हैं लाले।  तुम किस खेत की मूली हो ? हमारा खा के हमीं पे म्याउं। पेट की आग सब करवाएगी लाले।  फिल्म रिलीज होने वाली है ना। अब देखना अपना हश्र। छोड़ना मत दोस्तों फिल्म आने वाली है इसकी, पूर्ण बहिष्कार करो इनका।  इनको इनकी औकात दिखाओ। 


#Don't let him go, still boycott his films & products.  

गदहा Vs स्नैपडील

"खेत खाए गदहा मार खाए जोलहा"  या   "खाया पीया ख़ाक नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना".......... वाली कहावत सा हाल हो गया है स्नैपडील का। 

Monday, November 9, 2015

साधू

साधू क्यों दिमाग खराब कर रहा है, ये राजनीति के पचड़े में अपने पाँव क्यों घुसा रहा है। ये तेरा काम नहीं है। तू चल अपने काम पे। ना घर तेरा ना घर मेरा दुनिया रैन बसेरा। लेना एक न देना दो। फिर क्या घर फूंक तमाशा देखना? जीत तेरी होनी नहीं है और हार तुझे बर्दास्त नहीं। फिर क्यों हार जीत के खेल में उलझ रहा है। छोड़ ये दुनिया जी का जंजाल है। फिर क्यों दिमाग खराब कर रहा है। जब उनका गला कटेगा तब तेरा भी कट जाएगा। नई कौन सी बात होगी? चल अपनी राह। हार जीत की लालसा गृहस्थियों के काम हैं। तू चल यहाँ से.…… छोड़ देश दुनिया। चल अपनी राह। सैर कर अंतर्मन की,  मौज कर मौज में रह। चल खुसरो घर आपने…
साधो ये मुर्दों का देश....

Friday, October 23, 2015

ऑपरेशन

अंदर केबिन में बच्चा जोर जोर से चीखने लगा मम्मी मम्मी मम्मी और उसके बाद तो पूछो मत बच्चा सारा रामायण महाभारत वेद कुरआन सब बांच गया। पांच मिनट में 375 गालियां। माशाअल्लाह क्या जुबान पाई थी लौंडे ने। कमाल था। ठेठ गांव का छोरा। बित्ते भर का छोरा और गज भर की जुबान यहीं देख रहा था। लेकिन महाशय जब अपने पर बीतती है तभी असल समझ में आता है। सारी अकलियत, शराफत, नफासत और नजाकत धरी की धरी रह जाती है और बन्दे में वही ठेठ देशी गंवई माटी की महक आने लगती है। और अगला सारी पढ़ाई लिखाई किनारे रख, जितना याद है सब एक सांस में सुनाने लगता है। और याद भी क्या क्या है..... आए हाए हाए हाए.....सब नजर आने लगता है। सात पर्दों में छुपी शराफत की नकाब जब उतरती है तो बस अल्लाह कसम जी करता है कच्चे धागे से गला घोंट दें। अगले का हाल देख के मेरी तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गई थी। वैसे तो हम फेसबुक पर रोज ही खून खच्चर करते रहते हैं। ये कर दूंगा वो कर दूंगा ब्ला ब्ला ब्ला लेकिन उस समय काटो तो खून नहीं वाला हाल था। बच्चा अभी गालियां ही दे रहा था उसका बाप उसे गोद में उठाए हुए बाहर ला रहा था। अपना तो जिया धड़क धड़क जाए वाला हाल हो रहा था। तभी केबिन से आवाज आई नेक्स्ट। आइला मेरा नम्बर। अपन पसीने पसीने हो गए याद ही नहीं था कब आखिरी सुई लगी थी। साथी ने धकियाया चलो ना, खैर जी कड़ा करके टेढ़े टेढ़े आगे बढ़े। क्या हुआ है? जी फुंसी है ...... साला फोड़े को फुंसी बोल दिए..... कहाँ है? अड्डा बताया। अगले ने फरमाया लेट जाओ ये करो वो करो...... किया सब जो वो बोलता गया। और करता भी क्या? मजबूरी थी दवाइयों के काबू के बाहर जा चुकी थी बात। बस जी अगले ने सीधी टेढ़ी बांकी सारी तरह की कैंचियां सामने रख दीं। उसके असलहे देख के और पिछले वाले का हाल देख के अपना तो खून जम गया। अगला थोड़ी देर तो घाव को ग्लब्स पहने हाथ से छू छा कर देखा फिर तो हमारे मुँह से "आए याये याये याये" की आवाज ही निकली। भोवइ वाले ने पिछले मरीज की खुन्नस भी मेरे ही घाव पर निकाल दी थी। इतनी जोर से दबा रहा था कि मेरी तो जान ही निकल गई एक मिनट भी नहीं लगा होगा और दिन में तारे नजर आने लगे थे। खैर जो माल मटेरियल निकला था सब पोंछ पांछ कर फिर वो टेढ़ी वाली कैंची में रुई फंसा कर लाल दवा में डुबोया और फिर....... ......जयकारा शेरा वाली दा.... आए याये याये याये की आवाज की जगह .... उ हू हू हू हू बस बस बस। दस पन्द्रह सेकेण्ड में ही अगले ने सारी हेकड़ी बाहर ला दी। उसके बाद अगले ने बमुश्किल 30 सेकेण्ड में टेप टाप लगा के मरहम पट्टी कर दी और बोला हो गया चलो जाओ। उस समय तो वही मरीज वाली टेबल ही डनलप का गद्दा लग रही थी। दिल कर रहा था थोड़ी देर वहीं लेटा रहूँ लेकिन हिम्मत मार के उठा और मन ही मन उस लौंडे से दुगनी ज्यादा गालियां देता टेढ़े टेढ़े बाहर आ गया। लिखी हुई दवाइयाँ ली हिदायत पूछी अगली ड्रेसिंग का दिन पूछा और बैक टू पैवेलियन। साथी भी ससुरा पूरा पाजी सीधे सीधे रास्ते के बजाए गड्ढे गड्ढे गाड़ी चला रहा था गचकी दे के और दुखा रहा था।
डक्टरवो ससुरे पूरे बदमास होते हैं, अरे यार फोड़ा फुंसी देख के धीरे से दबाओ, अगले को पहले से ही दुःख रहा है। लेकिन नहीं, चेकअप करते समय ही ससुरे मजा लेते हैं फोड़वा को और जोर से दबा देते हैं भोवइ वाले। जब मरीज से "आए याये याये याये" की आवाज न निकलवा लें तब तक उनको भी चैन नहीं पड़ता है।
खैर 4 दिन से राम भजो हित नाथ तुम्हारा गा गा के काम चल रहा है कल अगली ड्रेसिंग का दिन है। हुआ क्या है कि "बम" पे "ऐटम बम" निकल गया है। "ऐटम बम" नहीं समझे? फुंसी यार। वहीं "उसी जगह" वही अंजन की सीटी से म्हारा "बम" डोले वाले "बम" पे। हंसो मत यार।
फलाने Raj Yadav और बड़के डाक्साब Vivek Giri जी क्षमा करियेगा। का करें एतना जोर से दबाए हैं की आशीर्वाद तो इकल नहीं रहा है।

Tuesday, September 8, 2015

धमकी

औकात में रह यार, क्यों पजामे से बेबात बाहर आ रहा है। बेबजह इतना कूदेगा तो पजामा भी उतर जाएगा। अपनी औकात तो देख तेरा अपना मुल्क तुझसे सम्भल नहीं रहा है। और तू हमें मटियामेट करने की धमकी दे रहा है। ये देख बी एस एफ का कश्मीर का स्ट्राइक तुझसे सम्भल नहीं रहा है। सेना को तू कैसे झेल पाएगा। खुद दो टुकड़े होने की राह पर है यार। अपना घर सम्भाल ले, लड़ाई वड़ाई बाद में कर लेना। अपने भूखे लोगों को रोटी पानी दे उनके लिए अस्पताल की व्यवस्था कर। लड़ाई से तुझे कुछ हासिल न होगा। अब तक तू लड़ाई के बाद भी मेज पर जीत जाता था पर अब भूल जा की लड़ाई के बाद भी तू मेज पर जीत जाएगा। अब तू हारेगा भी और बर्बाद भी हो जाएगा। और ये परमाणु बम की धमकी किसी और को दिया कर यार। ये एटमी खिलौने तेरी औकात से बाहर की चीज हैं। खामखाँ इन पर अपनी एनर्जी मत वेस्ट किया कर। इसका यूज कर मिस यूज मत कर और अपने उस बुढऊ डिफेन्स मिनिस्टर और उस पगलेट राहिल को समझा फालतू की बकवासें न किया करें। अपने बच्चों को गलत इतिहास पढ़ा कर ये मुगालता न पाल ले कि पिछले युद्ध तू जीत चुका है। दिमाग में ठण्ड रख और अपने मुल्क को तरक्की के रास्ते पे ले जा। बकवासें जरा कम किया कर।

Saturday, February 14, 2015

वेलेंटाइन डे स्पेशल

वेलेंटाइन डे स्पेशल : अथ श्री वेलेंटाइन बाबा की कथा विशेष

लड़का - लड़की:
लगाव
झुकाव
पटियाव
घुमाव
फिराव
गिफ्टियाव
फिर
झगड़ाव
फिर
समझाव
बुझाव
नहीं बात बने तो
अलगाव
विलगाव

लड़के का परिवार ( अफेयर का पता चलने पर)
थपड़ियाव
दुनियादारी
समझाव
बुझाव
बताव
(नहीं माने तो)
लतियाव
(फिर भी नहीं माने तो)
बियाह कराव
मामला निपटाव
पैंडा छुड़ाव

मजनूं पकड़ो दल विशेष : ये या तो किसी से खार खाए होते हैं या किसी से खुन्नस होती है या इनकी किसी और के साथ सेट हो गई होती है या और भी बहुत कुछ

लट्ठ को तेल पिलाव
छापामार दल बनाव
जानकारी जुटाव
रेस्तरां रेस्तरां पार्क पार्क
पहरेदार बिठाव
लपटा लपटी करते पकड़ाव
पहले कंटापियाव
फिर लतियाव
धमकाव
दो चार लट्ठ जमाव
दोनों के माता पिता बुलाव
हैण्ड ओवर कराव
पुलिस आ जाए तो
पहिले हड़काव
रुआब दिखाव
फिर ना माने तो
पुलिस से
एक आध
लट्ठ खाव
हाथ छुड़ाव
कोशिश कराव
और
खुदै भाग जाओ

कथा विसर्जन होत है। ॐ शांतिः शांतिः शांतिः

Wednesday, October 29, 2014

धूप

दूर क्षितिज पर उगता सूरज
गुन गुन करती आती धूप
रिश्तों की गरमाइश में
तार पिरोती आती धूप
यहां वहां की ओछी बातें
कुछ समझी कुछ सोची बातें
कुछ छोटी कुछ मोटी बातें
कुछ उल्झी कुछ सुल्झी बातें
रिश्तों की ठंढ़ाईश में
गुन गुन जीवन लाती धूप
चिट्ठी पत्री की बातें
मान मनौवल की बातें
खाट खटोलों की बातें
समझ सयानों की बातें
दूर हुए रिश्ते नाते
अंधकार की बदली में
जीवन नृत्य कराती धूप
सूरज अस्ताचल को जाता
धीरे धीरे जाती धूप
जीवन के गहरे अर्थों को
समझाती है,  जाती धूप
जीवन की उत्तरवेला पर,
नवजीवन की राह दिखती,
चलती जाती ठंडी धूप।


​नवजीवन का आशय यहाँ देहावसान के पश्चात् नया शरीर धारण करने से है।  

Tuesday, July 29, 2014

समझदारी

अर्थ निरर्थक हो जाते हैं।
यदि तुम इसको ना समझो तो।।

शब्द निरर्थक हो जाते हैं।
यदि तुम इसको ना जानो तो।।

धर्म निरर्थक हो जाता है।
यदि तुम इसको ना मानो तो।

समय निरर्थक हो जाता है।
यदि तुम इसको ना आंको तो।।

सीख निरर्थक हो जाती है।
यदि तुम इसको ना धारो तो।।

दौर ए जहाँ


किस दौर में बैठे हैं हम।
न तुमको पता है न हमको पता है।

समय का मुसाफिर कहाँ जा रहा है।
न तुमको पता है न हमको पता है।


छिड़ी है बहस किस तरफ जा रहे हैं।
न तुमको पता है न हमको पता है।


समय की ये धारा कहाँ जा रही है।
न तुमको पता है न हमको पता है।


कहाँ से चले थे कहाँ आ गए अब।
न तुमको पता है न हमको पता है।


वो स्वर्णिम सवेरा फिर से आएगा क्या।
न तुमको पता है न हमको पता है।

राष्ट्रीय अधिकार

"थूकिये भाइयों और बहनों को सादर समर्पित"

थूक थूक थूक थूक
थूक थूक थूक थूक

इधर थूक उधर थूक
यहाँ थूक वहां थूक
जहाँ दिल करे और  जहाँ मुंह भरे
वहीँ पर तू थूक

थूक थूक थूक थूक
थूक थूक थूक थूक

ये कोने
ये सडकें
ये सरकारी बिल्डिंग
ये सुंदर से गमले
तुम्हारे लिए हैं
जहाँ दिल करे और  जहाँ मुंह भरे
वहीँ पर तू थूक

थूक थूक थूक थूक
थूक थूक थूक थूक

आक्थू पिचक थू के स्वरों का ये गुंजन
होठों पे सजता ये रक्ताभ चन्दन
कभी भी कहीं भी
अचानक ये आक्थू
सड़कों दीवारों पर सजती ये आक्थू
चलते मुसाफिर को कर देती हतप्रभ

जहाँ दिल करे और  जहाँ मुंह भरे
वहीँ पर तू थूक

थूक थूक थूक थूक
थूक थूक थूक थूक

चलते चालाते लकड़बम्ब (सुर्ती )लेके
चूना मिलाके हथेली रगड़ते
कड़क हाथों से फिर उसको फटकते
समवेत स्वरों में फिर पिचक थू के नारे लगाते
जहाँ दिल करे और  जहाँ मुंह भरे
वहीँ पर तू थूक

थूक थूक थूक थूक
थूक थूक थूक थूक


Saturday, May 31, 2014

भगवान शिव को समर्पित

हे परम शिवम 
हे नाथरूप 
हे जगन्नाथ 
हे महाबली 
हे सत्यरूप 

हे परम शिवम 
हे रुद्ररूप 
हे महाकाल 
हे भद्ररूप 
हे अभयरूप 

हे परम शिवम 
हे प्रेमरूप 
हे शान्तरूप 
हे ज्ञानरूप 
हे शक्तिरूप 

हे परम शिवम 
हे करुणरूप 
हे क्षमारूप 
हे दयारूप 
हे मातृरूप 

हे बिंदु रूप 
शिव तुम ही हो।  

अच्छे दिन आने वाले हैं

अहंकार की थी पराकाष्ठा
उन्मत्त थे बोल 
शासन बना था कुशासन  
मेढ़ खाती थी खेत 
रखवाला बना था सेंधमार 
सीमाएं थी असुरक्षित 
शत्रु हो रहे थे प्रबल 
सर ऊंचे हो रहे थे बागिओं के। 
प्रजा थी परेशां 

एक आंधी सी आई 
छंटा तब कुहाषा 
काली बदली से निकला 
आशाओं का सूरज 
मन की उमंगों ने ली 
एक अंगड़ाई 
सुनहले दिनों की 
एक आभास आई। 

भगवान शिव को समर्पित

हे जगदीश्वर
हे अखिलेश्वर 
हे सर्वेश्वर 


हे ज्योति लिंग 
शिव तुम ही हो।

हे राजेश्वर 
हे देवेश्वर 
हे परमेश्वर

हे ज्योति लिंग 
शिव तुम ही हो।

हे ज्ञानेश्वर 
हे करुणेश्वर 
हे प्राणेश्वर 
हे ज्योति लिंग 
शिव तुम ही हो।

हे मक्केश्वर 
हे रामेश्वर 
हे सोमेश्वर 

हे ज्योति लिंग 
शिव तुम ही हो।

हे दया निधे 
हे कृपा निधे 
हे सुधा निधे 

हे ज्योति लिंग 
शिव तुम ही हो।

​हे अविरामी 
हे अभिरामी 
हे अविनाशी 

हे ज्योति लिंग 
शिव तुम ही हो।

हे निराकार
हे निर्विकार 
हे निरहंकार 

हे ज्योति लिंग 
शिव तुम ही हो।

आर्त ध्वनि को सुनने वाले 
प्राणसुधा बरसाने वाले 
श्वांस श्वांस में बसने वाले।  

हे ब्रह्मेश्वर 
हे ज्योति लिंग 
शिव तुम ही हो।

सत्यम शिवम् सुंदरम। 

अच्छे दिन आने वाले हैं

गहन तिमिर की घटाएं 
प्रतिकूल व्यवस्थाएं 
निगलने तो आतुर लोलुपताएं
कंटकीर्ण रास्ते 
चहुंओर घेरे विषधर भयंकर 
आस्तीनें में बैठे नाग जहरीले 

लहराया परचम फिर भी सुहाना 
आशाओं का दीपक हुआ फिर प्रज्ज्वलित 
सुनहरे दिनों का आकांक्षित हुआ मन 
उगने को है फिर से वैभव का सूरज 
सुखी मन सुखी जन है गर्वित ये भारत 

Thursday, April 17, 2014

यात्रा वृतांत

यात्रा वृतांत - हास्य कथा वृतांत

आज कल चुनावी राजनीति की गहमा गहमी चल रही है, धड़ा धड़ राजनीतिक विषयों पे आर्टिकल पे आर्टिकल छप रहे हैं , ले तेरे की, दे तेरे की , धत तेरे की का सा वातावरण बना हुआ है। तलवारें अपने प्रतिद्वंदियों पर खिंची हुई हैं, ये अलग बात है कि भांजते भांजते कभी कभी वही तलवार खुद को तो कभी अपने ही पाले वाले का नाड़ा काट दे रही है।  लेकिन बाज बहादुर फिर से नाड़े में गाँठ मार के मैदान डट जा रहे हैं और फिर से वही बतकही और जूतबाजी का दौर शुरू।  एक बात बोलने की देर है दूसरा लपक के उस बात को उठा ले रहा है और बत्ती बना के वापस ?????? ???? अरे नहीं भाई …… दूसरे के फिर तीसरे के कान में डाले दे रहा है और घुमा फिरा के उस बत्ती में और बट मार के वापस बोलने वाले के ही कान में वापस दे  दे रहा है,  बोलने वाले को पता ही नहीं चल रहा है मेरी बोली हुई बात ही है या कोई और।  मुंह बोलते बोलते भन्नाया हुआ है और कान सुनते सुनते झन्नाया हुआ है, दिमाग के १२ बजे हुए हैं,गर्मी इतनी है कि फूस कब आग पकड़ ले रहा है पता ही नहीं चल रहा है। नतीजा "कमल" फूल छाप "झाड़ू" कब "हाथ" के  निशान के साथ कभी गाल पर तो कभी गर्दन पर छप जा रहा है।  कहीं चल चल चल मेरे हाथी तो कहीं चांदी की साईकिल सोने की सीट का गान चल रहा है।  इन्ही सब के बीच बस वाला तेज आवाज में "मुँहवा पे ओढ़ के चदरिया लहरिया लू---ट, ए राजा" का मधुर संगीत बिखेर रहा है। समझ के बाहर का जबरदस्त माहौल है। 

खैर छोड़िये इन बातों को चलिए कुछ और सुनाता हूँ आपको ………………… यात्रा वृतांत 

कल दीदी और छोटी बहनों के साथ कहीं जाना था,  टैक्सी वाला कार लेके आ गया था एक घंटे का सफर था।  लेकिन घर से निकलने में ही आधा घंटा निकल गया, कभी ये ले लो, कभी ये रख लो, कभी कुछ मिल नहीं रहा है उसका हड़कम्प। कभी उसने ये मंगाया था वो टाइम पे मिल नहीं रहा है।  उसी में गरमा गर्मी , रूठना मनाना चल रहा था।  खैर जैसे कैसे सफर पे निकल ही पड़े।  गर्मी बहुत थी बाहर तो टैक्सी वाले को बोला की भाई एसी चला दे।  वो अलग से गरम होने लगा की उसके अलग से चार्जेज लगेंगे पहले नहीं बताया था आपने ,पहले ऑफिस में बात करो।  कुछ कह कुहा के उसने एसी चला दिया। "टाइम पे चलना नहीं होता है तो टाइम पे बुलाते क्यों हैं लोग"  के  मधुर कटाक्ष के साथ सेल्फ मारने की क्रिया आरम्भ हुई, खैर छोड़ो … चलो भाई चलो भाई के नारों के साथ यात्रा प्रारम्भ हुई। 

बचपन से देख रहा हूँ जब भी कहीं  जाना होता है और घर में रोड़ा ना मचे ये संभव ही नहीं है।  ये सिर्फ मेरे ही घर का हाल नहीं है , लगभग सभी घरों का यही हाल है , शायद की कोई खुशकिस्मत होंगे जो बिना हल्ला गुल्ला मचाए चुप चाप चले जाते होंगे।  इन्ही सब बातों में खोए मेरे जहन में कुछ पुरानी अपनी और कुछ दूसरों की बातें घूम गई, जो आप लोगों के साथ शेयर कर रहा हूँ :

​हमारे एक पारिवारिक भाई साहब अपने तीनों बच्चो के साथ कहीं जा रहे थे , बच्चे छोटे ही थे।  भैया भाभी आगे बैठ गए और बच्चों को पीछे की सीट पे डंप कर दिया। बच्चों के बैठने स्थान फिक्स नहीं किया था,  बस जी लड़ाई शुरू।  एक लड़का और दो लड़कियां जैसा की हर घर का किस्सा है।  अब शिकवा शिकायतों का दौर शुरु.  ऐ पापा दे-ए-ख असुवा मार.…ता ।  लड़ाई की जड़ खिड़की के पास बैठने को था , बच्ची को समझा बुझा कर बीच में बैठा दिया गया और असुवा को किनारे की सीट मिल गई।  नंग असुवा को कुछ ना कुछ शरारत तो करना ही था , गर्मियों के दिन थे , कार का एसी ऑन  था लेकिन कूलिंग नहीं हो रही थी।  ए … भाई एसिया बिगर गइल बा का।  करवा तनिको  ठंडात नइखे। कहले रहनी की जाए से पहिले करवा केहुके देखवा लीहा- भाभी ने कहा , बस यही महाभारत की शुरुआत थी।  पलट के भैया का जवाब आया - दिमागवा दिनवा भर गरम रही त करवा कहाँ से ठंडाई।  बस जी सब कुछ छोड़ के दोनों मियां बीबी एक दूसरे पे पिल पड़े पांच दस मिनट तोहार हमार, हई हऊ,  एकरा ओकरा, में ही निकल गए, आपसी झगड़े में किसी ने कारण ढूंढने की कोशिश नहीं की और ऊपर से दोनों मुंह अलग से फुला के बैठ गए।  खैर जैसे तैसे लड़ाई खत्म हुई तो बीच में बैठी हुई बच्ची ने बताया की असुवा ने खिड़की खोल रखी है।  एहिसे करवा ठंडात नइखे।  फिर क्या था भइया की मुख रुपी तोप असुवा की तरफ घूम गई।  ए सोसुर तोहार दिमागवा ख़राब बा का, खिड़िकिया काहे खोलले बाड़े।  एक बार तो मारने के लिए भी लपके लेकिन ये तो कहिये बाजार के बीच से जा रहे थे और रोड पर भीड़ ज्यादा थी, नजर हटी और दुर्घटना घटी वाला माहौल था और आसु बाबू बच गए।  थोड़ी देर बाद जगह पा  भइया फिर से लपकने की कोशिश कर थे की आसुवा को एक आध कंटाप लगा दें।  लेकिन भाभी उनकी मंसा भांप चुकी थीं सो उन्होंने वहीँ बैठे बैठे धमकी भरा अल्टीमेटम सुना दिया कि ओकरा के मरनी त ठीक ना होई।  अब्बे हम चलत कार से उतर जाइब।  बोलते बोलते उन्होंने अपने साइड का दरवाजा भी एक बार खड़का दिया।  भइया माहुर कूंच के रह गए और असुवा को परसादी देने से वंचित किये जाने का अपराधबोध लिए चुप चाप गाड़ी चलाते रहे।  लेकिन गंतव्य पर पहुँचने के पश्चात् सामान इधर उधर रखने के मध्य भइया ने अपनी दबी हुई भड़ास निकालने की मंसा से "ए ससुर ठीक से उठावा" कह कर कान तो उमेठ ही दिया था असुवा का।  वो भी पट्ठा गजब का तेज था कान घुमाते ही जोर से चीख बैठा, हां हां का भइल का भइल का नारा समवेत वातावरण में गूँज उठा। कूछ ना.....  कूछ ना.…कह कर भइया ने  बात बनाने की कोशिश की, तनी मूड़ी लड़ गइल ह केवाड़ी से कह कर बात को दबाने की कोशिश की भइया ने।  भाभी असुवा के चीख मारते ही समझ गई थी कि ये हरकत क्या है।  खैर एक आदर्श भारतीय नारी की तरह उन्होंने बात को आगे ना बढ़ाते हुए, आवा बाबू आवा बाबू कह कर बच्चे का सर सहलाते हुए बात को वहीँ ख़त्म कर दिया।  

शेष फिर कभी ……    (पहली बार की लिखावट है इसलिए आप लोगों से माफ़ी की पूरी गुन्जाइश है) 
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